यदि प्रदेश और केंद्र सरकारे इमानदार तो प्रदीप कुमार शुक्ला का उत्पीड़न क्यों | वह भी पुलिस महकमा द्वारा

सुनिए प्रदीप शुक्ला जी का उत्पीड़न उन्ही की जबानी | मामला पुलिस अधीक्षक मिर्ज़ापुर के संज्ञान में फिर भी संतोष जनक प्रगति नही ऐसा क्यों |क्या भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करने वालो की यही दुर्दशा होती है मोदी और योगी की सरकार में फिर भी हमारे राजनेता इमानदार |

इस संदर्भ की जांच कर रही पुलिस विभाग में काम करने वाले अधिकतर आधिकारी पहले से ही भ्रष्टाचार के संक्रमण की चपेट मे है। अब तक मामले में तीन बार जांच हो चुकी है लेकिन लीपापोती के बीच बराबर अपराध की नेगेटिव  रिपोर्ट ही सामने आ रही है किंतु  प्रत्येक जांच में संक्रमण का असर दिखने से बराबर जांच  प्रचलित  करनी पड़ रही हैं। वर्तमान में तीसरी बार उच्च स्तर के निर्देश पर प्रकरण की पुनः जांच शुरू की गई है।

Mahesh Pratap Singh Yogi M P Singh <yogimpsingh@gmail.com>

Fwd: korona virus letter-14
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pardeep shukal <ereportor9@gmail.com> 2 May 2020 at 16:11
Bcc: yogimpsingh@gmail.com
PRADEEP SHUKLA


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Date: Sat 2 May, 2020, 1:19 PM
Subject: Fwd: korona virus letter-14
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PRADEEP SHUKLA
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From: pardeep shukal <ereportor9@gmail.com>
Date: Sat 2 May, 2020, 11:17 AM
Subject: korona virus letter-14
To: pradeep kumar shukla <ereportor9@gmail.com>

आरटीआई कार्यकर्ता का देश के नाम खुला  पत्र-14                      

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कोरोना कह रहा है …..

जरा उनकी भी सोचो जो वर्षों से लॉक डाउन में  फसे पड़े हैं।

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    मेरे द्वारा आप सभी को उपरोक्त संदर्भ में एक खुला पत्र लिखा गया था। पत्र को पढ़ने के बाद  कुछ राष्ट्र चिंतकों के द्वारा यह अपेक्षा की गई कि वास्तव मे जो कई वर्षों से लॉक डाउन मे पड़े हुए हैं। ऐसे पीड़ितों  की  कार्यवृति एवं समस्या देश के सामने आना चाहिए। इस  क्रम में आगे कुछ बताऊंइसके पहले  इस पत्र के साथ संलग्न ऑडियो लिंग को  खोलकर   ध्यान से सुने। यह एक हिन्दी दैनिक अखबार के कार्यालय में  बीते 22 दिसंबर  को प्रश्न प्रहर कार्यक्रम के बीच मोबाइल पर पुलिस अधीक्षक मिर्जापुर डॉ धर्मवीर सिंह से हुई बातचीत हैजिसे सुनकर आपको पीड़ित का नाम पता के साथ उसका कार्य  और उसकी समस्या को संक्षेप में समझने मे आसानी होगी। 

      अधिकतर लोग करोना संक्रमण के साथ लाक डाउन शब्द सुना होगा और एक माह से बचाव के लिए बन्दिसो में रहकर इसका मायने  समझ रहे होंगे लेकिन वर्तमान संकट की भांति मैं स्वयं लगभग दो वर्षों से लाक डाउन में ही रहने के लिए विवश हू। अनावश्यक रूप से बाहर निकलनेभीड़-भाड़ वाले जगहों पर जाने से परहेजधार्मिक एवं सामाजिक समारोहों एवम आयोजनों में आवश्यक सावधानियों के साथ प्रतिभाग कर पाता हू। सोशल डिस्टेंसिंग के साथ ऐसी तमाम बंदिशें धीरे धीरे अब तो  हमारे जीवन शैली  का हिस्सा बन चुका है

         इस बीच जो लोग हमारे द्वारा बरती जा रही इन सावधानियों की वजह नहीं समझते हैं। उनके मन में मेरे प्रति कई प्रकार की चर्चा भी होती रही है ।  मेरे गाव मे तो मुझे असामाजिक ब्यक्ति का विशेषण तक दिया जाने लगा था किंतु आज सभी को कमोबेश कुछ ऐसी ही बंदिशों का पालन करना पड़ रहा है। फर्क इतना है कि आप में से अधिकतर लोग कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए कर रहे हैं । मैं कोरोना से भी खतरनाक  साबित हो रहे भ्रष्टाचार के संक्रमण से बचने के लिए कर रहा हूं। अब सवाल उठता है कि आखिर मुझे खतरा किससे और क्यो है?

       मुझे भली-भांति याद है कि  संपूर्ण प्रदेश विशेषकर ग्रामीण अंचलों में  वायु प्रदूषण  की भयावहता  के लिए  एक प्रमुख स्रोत बन चुके  हजारों ईट भट्ठा के द्वारा  पर्यावरण संबंधी नियम कायदों को ताक पर रखकर उनके अनियमित संचालन का खुलासे  मेरी आरटीआई  के जवाब में  हुआ है । इनके नियमित संचालन को सुनिश्चित कराए जाने के संबंध में हमारे कई प्रार्थना पत्रो के दबाव में तत्कालीन जिलाधिकारी श्री विमल कुमार दुबे के द्वारा एक बैठक बुलाई गई थी। 31 जनवरी 2018 की शाम जब हम बैठक में प्रतिभाग करने के लिए जिला मुख्यालय  पर स्थित जिला पंचायत सभागार में उपस्थित हुए। बैठक में डीएम साहब पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर बैठक को संबोधित करते हुए हम सभी के ऊपर ही बेवजह ब्लैकमिलर होने का गंभीर आरोप लगाना शुरु कर दिये। हमारे कुछ साथियों के हस्तक्षेप पर वे बैकफुट पर तो जरूर आए लेकिन उन में भ्रष्टाचार के संक्रमण के स्पष्ट लक्षण प्रतीत होने  रहे थे। जब हमने उनको हवा की महत्ता और वर्तमान की गंभीर पर्यावरण संकट पर ध्यान आकृष्ट करा कर अपनी बात रखनी शुरू की तो डीएम साहब ने हमे रोकते हुए कहा कि इसकी चिंता आप लोग मत करिएहम लोग देख रहे हैं। थोड़ी देर में वे निकले और चले गए । उनके जाते ही बैठक में मौजूद लगभग 200 ईट भट्ठा कारोबारियों में से दर्जनों माफिया किस्म के व्यक्तियों के द्वारा हमें घेर कर जिस प्रकार से हमें धक्का मुक्की के साथ गाली गलौज देकर अपमानित किया और जान से मारने की धमकी दी गयी। वह मिर्जापुर के प्रशासनिक इतिहास की पहली घटना थी । इसके पूर्व किसी डीएम की बुलाई गई बैठक में प्रशासनिक संरक्षण के बीच इस प्रकार की अराजकता पूर्ण घटना  नहीं घटी थी न ही आगे अब तक घटी है।  जिम्मेदार अधिकारी के बीच उन्हीं के संरक्षण में लोकतंत्र का यह संक्रमित स्वरूप ने मुझे सतर्क एवं बचकर रहने साफ संदेश दिया। मै स्वयोजित लाक डाउन मे रहने के लिए विवश हो गया। इस घटना के बाद बीते वर्षों में  मेरे द्वारा अपने बचाव में खुद के ऊपर थोपी गई सावधानीबंदिशें वर्तमान कोरोना काल से किसी भी दशा में कम नहीं है। कुछ स्थितियों में कुछ स्थान तो हमारे लिए भी किसी हॉटस्पॉट  जैसे ही लगते है।

       आपको यह भी जानकर आश्चर्य होगा कि घटना के वर्ष बाद भी निष्पक्ष जांच एवं दोषियों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं हो पाई है। इसका सबसे बड़ा वजह यह है कि इस संदर्भ की जांच कर रही पुलिस विभाग में काम करने वाले अधिकतर आधिकारी पहले से ही भ्रष्टाचार के संक्रमण की चपेट मे है। अब तक मामले में तीन बार जांच हो चुकी है लेकिन लीपापोती के बीच बराबर अपराध की नेगेटिव  रिपोर्ट ही सामने आ रही है किंतु  प्रत्येक जांच में संक्रमण का असर दिखने से बराबर जांच  प्रचलित  करनी पड़ रही हैं। वर्तमान में तीसरी बार उच्च स्तर के निर्देश पर प्रकरण की पुनः जांच शुरू की गई है।

       इन दो वर्षों में मैं अपनी सुरक्षा एवं भ्रष्टाचार संक्रमित सरकारीगैर-सरकारी व्यक्तियों के इलाज  और उनसे  स्वयं के बचाव  के लिए जितनी भी बार क्षमता संपन्न पुलिस अधिकारियों के पास गया। बराबर हमें निराशा ही मिल रही है । संक्रमण रुकने को कौन कहे  पहले से बढ़ता ही  जा रहा है। अब मुझे समझ में आने लगा कि कुछेक ईमानदार पुलिस अधिकारियों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर भ्रष्टाचार के वायरस से पूरी तरीके से संक्रमित  है । पहले तो इन्हीं का इलाज किया जाना नितांत आवश्यक हो गया है।  ताकि कोई भी जरूरतमंद उनके संपर्क में आए तो वह भी संक्रमित न हो जाए । ऐसे में बड़ी चुनौती यह  है कि आखिर  जब जांच करने वाली पूरी की पूरी संस्था ही संक्रमित हो तो जांच कौन करेगा । कैसे पता चलेगा कि कौन-कौन अधिकारी संक्रमित हैं तथा कौन इस संक्रमण से मुक्त है और भविष्य में संक्रमण मुक्त रह सकते है। इसको जानने समझने के लिए जब हमने आरटीआई के तहत अपने संदर्भ की दो वर्षों की  अलग-अलग सभी मामलों की जांच रिपोर्ट और कार्यवाही का विवरण मांगा तो कुछ में तो आधी-अधूरी रिपोर्ट मिली किंतु कई महत्वपूर्ण रिपोर्ट महीनों बीतने के बाद भी अब तक सामने नहीं आ पाई है । इसके लिए अब हमें सूचना आयोग और अन्य सक्षम न्यायालय का चक्कर लगाना पड़ेगा। इसके साथ ही भ्रष्टाचार के संक्रमण की स्थिति पहले से भी गंभीर हो सकती है । पहले अपने अनियमित कृत्यो को छुपाने के लिए अधिकारी पहली पूरी कोशिश करते हैं। इसमें विफल होने के बाद उनके द्वारा आरटीआई कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न के लिए फर्जी मुकदमे भी दर्ज किए जाते हैं । ताकि आरटीआई आवेदनों एवं शिकायतों की पैरवी बाधित हो सके।अब शायद आप  इस बात को समझ पाए होंगे कि मेरा गुनाह बश इतना है कि मै एक आरटीआई कार्यकर्ता हू और लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण के मामलों मे सहभागिता एवं हस्तक्षेप प्रभावी तरीके से कर रहा हूं ताकि  पर्यावरण एवं प्राकृतिक संपदा को पहुंचाई जा रही मनमानी क्षति रुक सके। इसके साथ ही स्वच्छ पर्यावरण तथा समृद्धि प्रकृति के बीच जीवन सुरक्षित एवं खुशहाल बना रहे ।   

    लगभग 10 वर्षों में आरटीआई के द्वारा पर्यावरण संरक्षण के नाम पर इस देश में चल रहे कई भ्रष्टाचार के बड़े खेल बेनकाब हुए हैं। जानकारी सामने आने के बाद  कुछ एक मामलों में जनहित एवं राष्ट्र को ध्यान में रखते हुए बड़ी कार्रवाई भी हुई है। वर्तमान में कुछ प्रकरण इस प्रकार के लंबित हैं कि यदि पोल खुल गई तो शासन प्रशासन के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है।

       अब आप आसानी से समझ सकते हैं की इस देश में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला वर्ग कौन है और उसे किन-किन लोगों का संरक्षण प्राप्त है। ऐसी दशा में किसी के लिए भी ईमानदारी से भ्रष्टाचार और पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों पर काम करना कितनी बड़ी चुनौती और जोखिम भरा हो सकता है । भ्रष्टाचार से संक्रमित लोग किसी न किसी प्रकार से सदैव अपनी चपेट में बराबर लेने के लिये तत्पर है । ऐसे मे लाक डाउन मे रहना कितना जरुरी है।

     वर्तमान कोरोना वायरस के संक्रमण और भ्रष्टाचार के संक्रमण दोनों  लाक डाउन के स्वरूपों में कमोवेश एकरूपता है। अंतर बस इतना है कि यदि आप कोरोना योद्धा है तो आपको थाली एवं ताली बजाने के साथ अन्य सभी  प्रचलित तरीकों से सम्मान मिलेगा और यदि आप भ्रष्टाचार के योद्धा है तो आपको गाली एवं आपमान के साथ अन्य  शाजिस एव षड्यंत्र का शिकार होना हो सकता है। एक और महत्वपूर्ण अंतर बताना जरूरी समझता हूं कि कोरोना वायरस परोक्ष रूप से व्यक्ति के लिये जानलेवा बन रहा है किंतु भ्रष्टाचार देश को  नुकसान पहुंचा रहा है। अब निर्णय आप सभी को मिलकर लेना है कि हमें कोरोना वायरस के संक्रमण पर जीत हासिल कर वर्तमान लॉक डाउन से बाहर निकलना ही है लेकिन पर्यावरण एवं भ्रष्टाचार जैसे गंभीर संक्रमण पर भी जीत पाकर हमारे जैसे कई अन्य भ्रष्टाचार विरोधी एवं पर्यावरण योद्धा  के साथ संपूर्णलॉक डाउन से बाहर निकलना है।

***अंत मे इस पत्र के माध्यम से ही मैं तमाम आरटीआई कार्यकर्तापत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता साथियों से विनम्र अपील करता हूं की यदि आपके कार्य वृत्ति के साथ कुछ इस प्रकार की समस्याएं जुड़ रही हो तो आप भी स्वयं उसे देश के सामने  रखने  का कष्ट करें।

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दिनांक  2 मई 2020

प्रदीप कुमार शुक्ला

आरटीआई / पर्यावरण  कार्यकर्ता  मिर्जापुर,उत्तर प्रदेश

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Preeti Singh
6 months ago

Conserving and improving our surrounding environment Human beings are the domineering organisms in the ecological system. For this reason, we can protect ecology by improving water quality, reducing environmental pollution, protecting biodiversity, and limiting the destruction of natural resources.
What is the loss if R.T.I. Activist Pradeep Kumar Shukla is raising voices against the growing air pollution because of chimneys of kilns who are not following set up norms by the government? Whether rules are made by the government to pressurize for bribe to consumers.

Arun Pratap Singh
6 months ago

Why R.T.I. Activists are either shot dead or persecuted by the concerned accountable public functionaries to whom information sought by the R.T.I. Activists? Now it is proved fact that R.T.I. Activists were more safe comparing to ongoing incumbent. Persecution of activist itself proves rampant corruption in the government machinery. How many times electorates will be misled by the political masters? Everyone has share in the public infrastructure, then why this infrastructure is being used by few people?

Beerbhadra Singh
Beerbhadra Singh
6 months ago

Here Role of the police is cryptic which must be investigated in transparent and accountable manner by an honest officer so that accountability may be fixed. Think about the gravity of situation that a public spirited individual working for ecology is being targeted because kilns are belonging to rich people who are influential so police favours them because of corruption as quite rampant in the public offices.

Bhoomika Singh
Bhoomika Singh
6 months ago

On the one side of a screen our political Masters are claiming to provide good governance which is not feasible without transparency and accountability in the government machinery but unfortunately on the other side of the screen they are torturing the public spirited individuals like Pradeep Kumar Shukla through their police department which is not mockery of the law of land and the false claim of good governance. For good governance there must be a transparent and accountable government.